अमेरिकन आश्रम की जमीन पर कब्जे के आरोप गोपनीय जांच हुई शुरू

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अमेरिकन आश्रम की जमीन पर कब्जे के आरोप गोपनीय जांच हुई शुरू


देहरादून के भूपतवाला क्षेत्र स्थित चर्चित अमेरिकन आश्रम की बेशकीमती जमीन को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। आश्रम की करीब तीन बीघा भूमि पर कांवड़ यात्रा के दौरान अचानक चारदीवारी किए जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि इस जमीन पर कब्जे के पीछे शहर के एक प्रभावशाली रईसजादे का हाथ है, जिसकी जमीन आश्रम की उक्त भूमि से सटी हुई बताई जा रही है।
मामले को लेकर आश्रम की ट्रस्ट व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जमीन पर अवैध रूप से चारदीवारी की गई तो ट्रस्ट की ओर से तत्काल इसका विरोध क्यों नहीं किया गया? ट्रस्ट से जुड़े पदाधिकारियों की ओर से अब तक कब्जे को लेकर कोई स्पष्ट और प्रभावी कार्रवाई सामने नहीं आने से कई तरह की चर्चाओं को बल मिल रहा है।जबकि सूत्र बताते है कि मामले में गोपनीय जांच शुरू हो गई है।इस खेल के करन अर्जुन रानीपुर मोड़ स्थित एक बेशकीमती फ्लॉट को पहले ही अपना बना चुके है


बताया जाता है कि भूपतवाला में स्वामी देवानंद के नाम से स्थापित इस आश्रम के पास करीब 26 बीघा भूमि है। करीब सात दशक से अधिक पुराने इस आश्रम की संपत्ति लंबे समय से लोगों की नजर में रही है। स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि ट्रस्ट की मुख्य कर्ताधर्ता बताई जाने वाली एक कनाडाई महिला पिछले कई वर्षों से विदेश में हैं और उनके वर्तमान ठिकाने तथा ट्रस्ट के संचालन को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
ऐसे में सवाल उठता है कि वर्तमान में आश्रम की संपत्तियों की देखरेख और ट्रस्ट का वास्तविक संचालन कौन कर रहा है? संत समाज के कुछ चर्चित लोगों के ट्रस्ट से जुड़े होने के दावे जरूर सामने आते रहे हैं, लेकिन जमीन पर हुए कथित कब्जे के मामले में उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
चारदीवारी के साथ जमीन को लेकर भी उठे सवाल
स्थानीय लोगों के मुताबिक आश्रम की पिछली तरफ करीब तीन बीघा भूमि पर अचानक चारदीवारी खड़ी कर दी गई। आरोप है कि जिस व्यक्ति की जमीन इससे लगी हुई है, उसकी जमीन पहले खाईनुमा स्थिति में थी। आरोप लगाया जा रहा है कि अवैध खनन के जरिए मिट्टी डालकर उसे समतल किया गया और अब आश्रम की भूमि से सटी जमीन को भी विकसित करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।
करोड़ों रुपये मूल्य की बताई जा रही आश्रम की भूमि को लेकर क्षेत्र में किसी बड़ी डील की चर्चाएं भी चल रही हैं। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक दस्तावेज या पुष्टि सामने नहीं आई है।
सबसे अहम सवाल ट्रस्ट की भूमिका को लेकर है। आखिर इतनी बड़ी जमीन पर चारदीवारी खड़ी होने तक ट्रस्ट के जिम्मेदार लोगों को इसकी जानकारी कैसे नहीं हुई? यदि जानकारी थी तो समय रहते विरोध या कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? चारदीवारी का निर्माण कुछ घंटों में पूरा होना संभव नहीं है, ऐसे में ट्रस्ट की कथित निष्क्रियता को लेकर सवाल स्वाभाविक तौर पर उठ रहे हैं।
अब पूरे मामले में प्रशासन और संबंधित विभागों से यह उम्मीद की जा रही है कि आश्रम की भूमि के स्वामित्व, चारदीवारी निर्माण, जमीन की पैमाइश और कथित कब्जे की निष्पक्ष जांच कराई जाए। जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि वास्तव में आश्रम की जमीन पर अवैध कब्जा हुआ है या इसके पीछे कोई अन्य विवाद है।