देहरादून।
उत्तराखंड में एक बार फिर सोशल मीडिया के माध्यम से सूचना विभाग के खिलाफ सरकारी धन की तथाकथित “बंदरबांट” को लेकर माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इस बार यह अभियान एक पूर्व पत्रकार द्वारा शुरू किया गया है, जिन्होंने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से जांच की मांग करते हुए सोशल मीडिया पर पत्र साझा किया है। पोस्ट में दावा किया गया है कि सरकार प्रचार पर एक हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर रही है और इसे रोका जाना चाहिए।
हालांकि, राज्य में इससे पहले भी कई बार इस तरह के आरोप सामने आते रहे हैं। कभी दिल्ली से जुड़े एजेंडेबाज, कभी वामपंथी विचारधारा से जुड़े समूह, तो कभी केंद्र सरकार विरोधी तत्व इस विषय को उछालते रहे हैं, लेकिन हर बार जांच और तथ्यों के स्तर पर यह अभियान दम तोड़ता रहा है। इसके बावजूद, हर कुछ समय बाद सोशल मीडिया पर “विधवा विलाप” की तरह वही आरोप दोहराए जाते हैं। यही नहीं सूत्र बताते है कि कुछ टीम ने उत्तराखंड के पत्रकारों से संपर्क कर ये भी आरोप लगवाने की साजिश रची थी कि विज्ञापन के एवज में पैसे लिए जाते है
जानकारों का कहना है कि उत्तराखंड जैसे छोटे लेकिन तेजी से विकासशील राज्य के लिए वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाना आवश्यक है। राज्य को पर्यटन, निवेश, रोजगार और नई योजनाओं के लिए देश-विदेश में प्रचार करना पड़ता है। इसी उद्देश्य से केंद्र और राज्य सरकारों के बजट में प्रतिवर्ष वृद्धि होती है, और उसी अनुपात में विभिन्न विभागों के बजट भी बढ़ते हैं।
किस विभाग को कितना और किस माध्यम से विज्ञापन देना है, यह सरकार और संबंधित विभागों का नीतिगत निर्णय होता है। यह प्रक्रिया निर्धारित नियमों और प्रशासनिक व्यवस्था के तहत संचालित होती है। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर इसे “बंदरबांट” बताकर पेश करना कई लोगों को महज भ्रम फैलाने का प्रयास प्रतीत हो रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विकास कार्यों, निवेश प्रयासों और राज्य को “ग्लोबल” पहचान दिलाने की सरकार की पहल को कमजोर करने के लिए ऐसे नैरेटिव गढ़े जाते हैं। बिना ठोस प्रमाणों के लगाए गए आरोप न केवल सरकारी तंत्र पर अविश्वास पैदा करते हैं, बल्कि राज्य की छवि को भी नुकसान पहुंचाते हैं।
फिलहाल, सोशल मीडिया पर उठे इस नए शोर को लेकर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन प्रशासनिक हलकों में इसे पहले की तरह ही “निराधार और एजेंडा प्रेरित” बताया जा रहा है। राज्य में यह आम धारणा बनती जा रही है कि हर बार की तरह इस बार भी यह अभियान तथ्यों की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा।

