देवभूमि के इस देवतत्व की रक्षा हम सबकी जिम्मेदारी है

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आईए – देवभूमि के इस देवतत्व की रक्षा हम सबकी जिम्मेदारी है

हमेशा से एक साथ संचालित होती रही है चारधाम और हेमकुंट साहिब की यात्रा
हेमकुंट साहिब के पहले ग्रंथी रहे हैं चमोली जिले में भ्यूंडार निवासी नंदा सिंह

देवभूमि उत्तराखंड की पहचान केवल उसके प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से भी है। इसका सबसे उत्कृष्ठ उदाहरण, चारधाम और हेमकुंट साहिब की यात्रा है। जो हमेशा से ना सिर्फ एक साथ सम्पन्न होती हैं, बल्कि इन यात्राओं से आपसी भाईचारा, सहयोग और समरसता को भी बढावा मिलता है। ऐसे में यदि क्षणिक राजनैतिक लाभ के लिए इस सद्भाव को ठेस पहुंचती है तो ये उत्तराखंड की संस्कृति के साथ ही आर्थिकी पर चोट पहुंचा सकती है।
चारधाम और हेमकुंट साहिब की यात्राएं हमेशा से एक-दूसरे के पूरक के रूप में आगे बढ़ती रही हैं। ना सिर्फ इन यात्राओं का एक प्रवेश द्वार (ऋषिकेश) है, बल्कि केदारनाथ, बद्रीनाथ और हेमकुंट साहिब के यात्री तो अपनी अधिकांश यात्रा अवधि में सहयात्री के तौर पर ही शामिल होते हैं। इसी तरह यात्रा मार्ग पर स्थानीय समुदाय, तीर्थयात्री और विभिन्न धार्मिक संस्थाएं मिलकर सेवा और सहयोग की भावना को भी मजबूत करते रहे हैं। यह परंपरा उत्तराखंड की उस सांस्कृतिक चेतना को दर्शाती है, जिसमें विविध आस्थाओं का सम्मान और पारस्परिक सद्भाव सर्वोपरि रहा है।

नंदा सिंह की विरासत
इतिहास भी इस साझा विरासत की पुष्टि करता है। चमोली जिले में हेमकुंट साहिब मार्ग पर पड़ने वाले भ्यूंडार गांव के निवासी नंदा सिंह करीब ढाई दशक तक हेमकुंट साहिब गुरुद्वारे के मुख्य ग्रंथी रहे। स्वर्गीय नंदा सिंह का जीवन इस बात का प्रमाण है कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक धारा हमेशा समावेशी और सौहार्दपूर्ण रही है। यही नहीं इन यात्राओं से उत्तराखंड की आर्थिकी को भी सहारा मिलता है, हजारों परिवारों की आजीविका इन धार्मिक यात्राओं पर ही निर्भर है।

वर्तमान समय में, कुछ क्षणिक घटनाओं को लेकर सामाजिक और डिजिटल माध्यमों पर अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। तब प्रदेश की गौरवशाली परंपराओं को स्मरण करना और भी आवश्यक हो जाता है। खासकर तब जब कुछ लोग राजनैतिक लाभ के लिए, इस सद्भाव पर चोट पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि एक पयर्टन राज्य के तौर पर हमें, तात्कालिक आवेश और आक्रोश को बढ़ावा देना है कि शांति और संयम के साथ स्थिति को संभालने का प्रयास करना है।