राज्य का एक और आईपीएस निशाने पर? फैसले से पहले मीडिया ट्रायल से उठे सवाल

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पांच अधिकारियों को दोषी मानने के बावजूद एक आईपीएस पर कार्रवाई की संस्तुति, प्राधिकरण की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह
देहरादून।
उत्तराखण्ड में एक बार फिर आईपीएस अधिकारियों को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है। राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण के हालिया फैसले ने प्रदेश में चल रहे आईपीएस बनाम पीपीएस विवाद को और हवा दे दी है। पांच साल पुराने एक बहुचर्चित प्रकरण में प्राधिकरण ने सभी संबंधित अधिकारियों को कार्य में अपचार का दोषी माना, लेकिन कार्रवाई की संस्तुति केवल एक आईपीएस अधिकारी के खिलाफ किए जाने से कई सवाल खड़े हो गए हैं।
मामला राजधानी देहरादून के क्लेमनटाउन क्षेत्र का बताया जा रहा है, जहां सुभाष रोड स्थित एक कोठी पर जेसीबी चलाकर कब्जे के प्रयास का आरोप लगा था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि स्थानीय थाना प्रभारी की मिलीभगत से उसका भवन ध्वस्त किया गया और पुलिस ने प्रभावी कार्रवाई नहीं की।
तत्कालीन पुलिस कप्तान द्वारा जनवरी 2022 में इस मामले में रिपोर्ट भेजे जाने के बाद उसी दिन क्षेत्राधिकारी को कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे और आरोपियों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई थी। साथ ही संबंधित थाना प्रभारी को निलंबित करने और आचार संहिता के चलते उसके स्थानांतरण के लिए चुनाव आयोग से अनुमति मांगी गई थी।
इसके बावजूद प्राधिकरण के फैसले में पांच अधिकारियों को दोषी ठहराया गया, लेकिन कार्रवाई की संस्तुति केवल एक आईपीएस अधिकारी के खिलाफ की गई। यही पहलू पूरे प्रकरण पर सवाल खड़े कर रहा है।
फैसले से पहले मीडिया ट्रायल पर भी सवाल
इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि प्राधिकरण का अंतिम निर्णय आने से पहले ही मीडिया में इस पर लगातार खबरें चलती रहीं। इससे न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं।
आईपीएस अधिकारी के प्रतिनिधि वरिष्ठ अधिवक्ता योगेश सेठी का कहना है कि उन्हें भी इस फैसले की जानकारी मीडिया के माध्यम से ही मिली है। उनका आरोप है कि अभी तक न तो आदेश की सत्यप्रति प्राप्त हुई है और न ही कोई आधिकारिक सूचना दी गई है, जबकि आदेश पहले ही सार्वजनिक हो चुका है।
उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी न्यायिक या अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया में आदेश से पहले मीडिया में जानकारी का प्रसारित होना विधिक परंपराओं के विपरीत है और यह गंभीर चिंता का विषय है।
प्राधिकरण की निष्पक्षता पर उठे सवाल
सूत्रों के अनुसार, सुनवाई के दौरान ही संबंधित आईपीएस अधिकारी ने आशंका जताई थी कि पूरी प्रक्रिया विभागीय राजनीति से प्रभावित हो सकती है। उन्होंने यह भी आपत्ति उठाई थी कि प्रकरण की सुनवाई कर रहे एक सदस्य के करीबी रिश्तेदार पीड़ित पक्ष के वकील थे। हालांकि बाद में संबंधित सदस्य ने खुद को सुनवाई से अलग कर लिया था।
अब इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तराखण्ड में प्रशासनिक व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब पांच अधिकारियों को दोषी माना गया तो कार्रवाई केवल एक के खिलाफ क्यों?
फिलहाल, संबंधित आईपीएस अधिकारी की ओर से कहा गया है कि आदेश की प्रति मिलने के बाद उसका विस्तृत अध्ययन कर आगे की कानूनी कार्रवाई पर निर्णय लिया जाएगा।